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Showing posts from August, 2020

कोई भी बात में अपसेट होने के बजाए नलेजफुल के सीट पर सेट हो जाओ

सारे दिन में छोटी छोटी बातों में कितने अपसेट होते रहते हैं। किसी ने कुछ कह दिया , किसी ने कुछ कर दिया हम मूझ परते है । सारे दिन व्यर्थ चलते रहते। कमाया हुआ सब कुछ गवा देते हैं। और यही हम 63 जन्मो से अभ्यास कर रहे हैं। सोच सोच कर छोटी सी बात को बहुत बड़ा बना लेते हैं। बाबा ने हमें इतना सुंदर सत्य ज्ञान दिया जो हर बात से सेफ्टी दिला सकते हैं। सिर्फ उस ज्ञान जा सही जगह पर उपयोग करना है। ज्ञान हमे पढ़ कर भूलने के लिए नही मिल रहा है। उसे सही जगह यूज़ करने अर्थ दिया है। जैसे कि किसी ने कुछ गलत कह दिया उस बात पर दुखी नही होकर ऐसे समझ सकते हैं कि मेरा ही कोई हिसाब किताब था जो चुकतु हुआ है तो मन अपसेट नही होगा। कर्मो का गुह्य गति को याद रखेंगे तो समस्या समाधान हो जाएगा। हल्के रह सकते हैं। ऐसे ही हर बात का बाबा ने हमे स्पिरिचुअल अर्थ बताए हैं। हमारा सोच को भी स्पिरिचुअल बनाना है। ओम शांति

कारण देना गोया अपने को कारागार में दाखिल करना है।

63 जन्मो से हम दूसरों के कंधे पर बंदूक रख चलते आये हैं और यह हमारा संस्कार बन गया । हमे यह ज्ञान ही नही था कि हमे अपने को चेक करना है सुधारना हैं। कभी दुखी कभी सुखी हमारे जीवन मे आदत सी हो गया। उसी को साधारण समझ एक्सेप्ट कर रहे थे। आखिर वो दिन आया जब बाबा हमारा हाथ पकड़ा। हम बाबा के बने और हमे पता चला कि हमे अभी मनुष्य से देवता बनना है और हमे हर पल चेक भी करना है और चेकिंग करके चेंज करना है। हमारे संस्कार ऐसे बना हुआ है , हमारे वृत्ति ऐसी हो गयी है जो हम अभी भी बेहोशी हालत में उसी रास्ते पर चल रहे हैं। जब भी कोई पेपर आता है हम फेल हो जाते हैं और अपने को संतुष्ट करने के लिए कभी किसी आत्मा का कारण , कभी परिस्थिति का कारण या वाइब्रेशन का कारण दर्शाते हैं। बाबा कहते हैं यह रॉयल रूप में माया है। और इसी माया के जाल में फसते जाते हैं और एक समय ऐसा होता हैं कि उससे निकलने का रास्ता नही मिलता। जैसे कि कारागार में बंध हो गए। इसीलिए बाबा कहते हैं अभी वृत्ति के लेवल पर चेक करो और अपने को चेंज करो तो कर्मातीत अवस्था को पा लेंगे। ओम शांति

जब आप घटनाओ और हो रहे वक्त का स्वीकार करते हो , तो आप आध्यात्मिक हो

बाबा कहते हैं बच्चे हर परिस्थिति में अचल अडोल रहो। ड्रामा के इस साईकल में जब हम मनुष्य से देवता बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं तो हमारे रास्ते मे छोटी बड़ी बहुत परीक्षाएं आती है। उस परीक्षा दौरान हमारा स्थिति कैसा रहता हैं उससे पता चलता है पुरुषार्थ में कितना आगे बड़े है। देखा गया हैं कि अक्सर हम बड़े बड़े परीक्षाएं क्रॉस कर लेते हैं अचल अडोल रह कर पर छोटी परीक्षाओ में हम बहुत ज्यादा हिल जाते हैं। विकार प्रबल हो जाता हैं। व्यर्थ के जाल में फस जाते है। कभी कभी आँसू भी बहाने लग जाते हैं। उस समय न ड्रामा न कोई ज्ञान के पॉइंट्स याद आती हैं। बाबा कहते न न दुख दो न दुख लो। हम दुख तो कम देते हैं पर दुख बहुत जल्दी ले लेते हैं। कई दिन तक उस घटना पर मनन करते रहते हैं। वृत्ति को चेक करना दूर की बात अपने संकल्पो पर भी काबू नही होता है। बाबा ने हमें राजयोग सिखाया है और उसी से इस मन रूपी घोड़ा को कंट्रोल करना है। ज्ञान और योग के सहयोग से आत्मा को शक्तिशाली बनाना है। रास्ते पर चलते समय ट्रैफिक तो होगा ही पर हमें उसे किनारा कर मंजिल तक पहुचना है। इस रूहानी यात्रा में भी बहुत घटना रूपी विघ्न आएगा हमे उन घटनाओ...

जब आप दूसरे जैसे हैं , वैसा उन्हें स्वीकारते हो तो आप आध्यात्मिक हो।

हर आत्मा अलग अलग संस्कार कुछ पिछले जन्म से कुछ इस जन्म से लाते हैं। इस सृष्टि रंग मंच मे वैरायटी एक्टर्स अपना अपना रोल प्ले कर रहे हैं। सब एक जैसा पार्ट नाटक में प्ले करे तो नाटक कोई नही देखेगा। मनोरंजन नही होगा। हर आत्मा का कुछ अच्छा और कुछ बुरे संस्कार हैं। बुरे संस्कार को बाबा कहते हैं नही देखना और हम सबसे पहले बुरे को देखते और क्यों क्या करते करते व्यर्थ में चले जाते हैं। आत्मिक शक्ति को घटा देते हैं। बाबा इतने सारे बच्चों का बुरा और अच्छा संस्कार सहित अपना बनाया है । अगर हमें बाप समान बनना है तो तो हमे भी सबको बुरे संस्कार सहित सेवा साथियों को स्वीकार करना होगा। साथ में उस बुरे संस्कार द्वारा ही हमारा हिसाब किताब चुकतु होगा। बाबा ने हमे ड्रामा का आदि मध्य अंत का राज़ समझाया, नॉलेज दिया। तो ऐसे समय पर ड्रामा को ढाल के हिसाब से यूज़ करने का अभ्यास चाहिए। बुद्धि में अगर रिपीट करते रहेंगे तो समय पर वो ढाल याद आ जायेगा और हम माया से बच जाएंगे। बाबा ने ये भी कहा है कि बाबा के आज्ञाकारी बच्चा बनेंगे तो बाबा हमे सेफ रखेंगे और बाबा का आशीर्वाद भी मिलेगा। ओम शान्ति

जब आप दुसरो को बदलने का प्रयास छोड़ के स्वयं को बदलना प्रारम्भ करे। तब आप आध्यात्मिक कहलाते हो।

बच्चे गुणग्राहक बनो बाबा कहते हैं। पर हम क्या कर रहे हैं। हर पल एक दूसरे का बुराई देखते हैं। सिर्फ देखते नही उसको गहराई से फील करते है, रियेक्ट करते हैं, परेशान भी होते हैं और अंत मे वर्णन कर सुख और दुख भोगते है। हम दूसरे को सुधारने की कोशिश करते है , करेक्शन करने की कोशिश करते हैं और यह सोचते हैं मै राइट हु और सामनेवाला रॉंग हैं वो सुधरे तो शांति हो जाएगा। खुद को ऑलवेज राइट सिद्ध करने का पूरा प्रयास करते हैं। एक जगह नही कर पाते तो दूसरे के पास कंप्लेंट ले कर जाते हैं जब तक सफलता नही मिलता ।जब इतना प्रोसेसिंग होता हैं तो वह अवगुण हमारे अंदर धारण कर लेते हैं। सोचते हैं वह करते ह तो मै भी करूँगी।शक्तिशाली बनने के बजाय कमजोर बन जाते हैं। बाबा कहते हैं होली हंस की तरह पत्थर को छोड़ मोती को चुगना है। जब गुण देखने का आदत होगा तो अवगुण दिखाई नही देगा। अवगुण देखना है तो स्वयं का देखे तो उन्नति होगा। कहा कहा मै कमजोर हु कैसे उस कमजोरी को दूर करना है उसपर चिंतन करना हैं और चेंज करना है। बाबा कहते है हर आत्मा का एक एक गुण देखेंगे तो सर्वगुण सम्पन्न बन जाएंगे। ओम शान्ति।

अशरीरी का प्रैक्टिस ने मेरा बीमारी ठीक कर दिया

बाबा आज मेरे आगे एक पेपर आया । था छोटा सा पर बाबा हम फैल हो गए। झरमुई झगमुई खूब किया । सिर भारी हो गया दर्द होने लग गया नींद नही आई । तब हम बैठ कर अशरीरी का प्रैक्टिस किया। दर्द बिल्कुल गायब हो गया। पहले हम दर्द का इंजेक्शन लगाते थे तब ठीक होते थे। पर आज तो कमाल हो गया बाबा । फिर शिव सतगुरु ने मुझे शक्ति से भरपूर कर दिया। थैंक यू बाबा।

मनमनाभव की विधि द्वारा बंधनो के बीज को समाप्त करने वाले नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप भव

बाबा ने हमे मंत्र दिया है मनमनाभव का। माना अपने को आत्मा समझ बाबा को याद करो। जितना बुद्धि को बाबा से जोड़ कर रखेंगे उतना बंधन मुक्त हो जाएंगे। इस सृष्टि के आकर्षणों से मुक्त हो जाएंगे। तो बाबा जो हमे ये मंत्र दिया है उसको बंधन से मुक्त होने के विधि कैसे बनाये। सबसे पहले अपने को आत्मा समझने का प्रैक्टिस करना है। जब खुद को शरीर नही आत्मा समझेंगे जब आत्मा का realisation होगा तभी बाबा से जुड़ सकेंगे। देह समझ कर भगवान को याद करके भगवान नही मिला। अभी बाबा आये हैं और हमे अपना परिचय दिया और कैसे बाबा से जुड़ना , भगवान को पाना है राजयोग द्वारा शिखा रहे हैं। बाबा ने कहा है बच्चे मन को मेरे में लगाओ तो तुम्हारा सोचने का काम मे करूँगा - भगवानुवाच। बाबा इतना निश्चिंत कर दिया है फिर भी हम बाबा को याद करना भूल जाते हैं। पापो का बोझा इतना ज्यादा है जो विनाशी चीज़ों में ही उलझे रहते हैं , नेगेटिव pleasure में ही डूबे रहते हैं। जितना बाबा से जुड़े रहेंगे उतना देहधारियों से नष्टोमोहा बन जाएंगे। ओम शांति

सहारेदाता बाप को प्रत्यक्ष कर सबको किनारे लगाओ

सहारेदाता होता है मुश्किल के समय सहारा बनना। सहारेदाता कभी भी कोई स्वार्थ से सहारा नही बनता। या रिटर्न में कुछ इच्छा नही रखते। सहारेदाता उदार दिल होते हैं। सहारा देते समय नापतोल नही करते। सहारेदाता स्वयं के लिए नही सोचते वो सहारा देने के लिए जी जान लगा देते हैं। ऐसे सहारेदाता कोई मनुष्य तो हो नही सकता। हमारा बाबा ही ऐसे सहारा दे सकते हैं। पर उस सहारा को पाने के लिए हमें बाबा को जानना जरूरी है। बाबा पर निश्चय होना चाहिए कि समय आने पर सहारा बनेंगे। जैसे महाभारत में द्रौपदी का जब दूर्यधन वस्त्रहरण कर रहे थे तब द्रौपदी भगवान को पुकार रहे थे सहारा के लिए। पर साथ साथ द्रौपदी का निश्चय काम था । उसने साड़ी को कस के पकड़ कर रक्खे थे। जब तक पकड़ रक्खी थी तब तक कृष्णा ने सहारा नही दिया। जैसे ही द्रौपदी ने आखरी पल्लू छोड़ा तो सहारेदाता का सहारा मिल गया साड़ी लंबा होते गया। बाबा ने एक मुरली में कहा है सक्सेसफुल बनने के लिए फेथफुल बनना जरूरी है। और फेथफुल माना निश्चयबुद्धि। हमे उस सहारेदाता को प्रत्यक्ष करने के लिए खुद को प्रत्यक्ष करना होगा और प्रत्यक्ष तब होंगे जब हम बाप समान बनेंगे हमे देख बाप याद आये...

किसी भी विधि से व्यर्थ को समाप्त कर समर्थ को इमर्ज करो

व्यर्थ ही हम ब्राह्मणों के लिए सबसे बड़ा माया । व्यर्थ से बचने से हम शक्तिशाली बन जाते हैं। पर व्यर्थ पर ध्यान हम कम देते हैं। बाबा हमे व्यर्थ से बचने के लिए बहुत युक्तियाँ बताते हैं। आत्मा का हिसाब किताब का बोझ के कारण हर पल व्यर्थ चलते रहते हैं। मन हमारा कंट्रोल से बहार हो गया। हर पल हर बात में क्यों क्या करके अनमोल समय को व्यर्थ गवाते हैं।बाबा हमे राजयोग सीखा कर मन पर कंट्रोल करने सीखा रहे हैं। तो बाबा जो हर मुरली में हमे श्रीमत देते हैं व्यर्थ से बचने के लिए वो हम कैसे करे व्यर्थ को समर्थ में कैसे परिवर्तन करे। 1) बाबा जो हमें ब्राह्मण जीवन का दिनचर्या दिया उसे एक्यूरेसी के साथ फॉलो करें।  अमृतवेला मिस नही करना। बाबा से सब कुछ शेयर करना है । रोज़ मुरली क्लास अटेंड करना , चिंतन करना , मुख्य पॉइंट्स नोट करना। मनन चिंतन ही व्यर्थ से बचने का रामबाण है। बाबा जो मुरली में धरना बताते हैं उसको कैसे अपने ज़िन्दगी में धारण करना उसके ऊपर चिंतन कर प्रैक्टिकल में लाना है। 2) हर पल अपने कमजोरियों को चेक करते रहना है और उसका निवारण कैसे करे चिंतन करना है।  3) परचिन्तन परदर्शन और परदोष से बच...

एक के अंत मे खो जाना अर्थात एकांतवासी बनना

एक के अंत माना एक से शुरू और एक मे अंत दूसरा कोई बुद्धि में न हो। संगम युग मे हमें इतना मीठा बाबा मिला। इस युग मे हमे हर पल बसब के साथ जूरे रहना है। 63 जन्मो से देहधारियों के साथ संबंध निभाया और अब एक जन्म में बाबा मिला तो इसमें एक सेकंड भी मिस नही करना है व्यर्थ नही गवाना हैं। झरमुई झगमुई में , इन्द्रिय सुख में समय गवाना नही है। अभी ह अतिन्द्रिय सुख भोगने के समय। हर पल , हर कर्म में अटेंशन चाहिए कहा हम आदत वश नेगेटिव आनंद भोग रहे हैं। बाबा बार बार मुरली में इशारा देते रहते पर हम सारे दिन परचिन्तन परदर्शन में डूबे रहते हैं। टेम्पररी आनंद ले रहे हैं। खुद को अच्छा सिद्ध करने के लिये दुसरो का बुराई करते हैं। तब हमारा इनर कॉन्स्कीयस कहते हैं सतर्क करते हैं कि कहा खो गए । ऐसे ही मेरा आज का अनुभव है। एक बहन ने मुझे टी वी न देखने के कारण कमेंट किया कि नए नए सब ज्ञान योग में भागने की कोशिश करते हैं पर थोरे दिन में बोर हो जाते हैं। इसलिए टी वी देखना चाहिए। एक बार मुझे लगा बाबा मुझे सतर्क कर रहे हैं कि कभी भी पुरुषार्थ में पीछे नही हटना बात को समा लेना चाहिए। पर आदत के वश दूसरे दिन कुछ आत्माओ के...