यह तो सृष्टि का नाटक है, इसमें ब्रह्माण्ड और सूक्ष्मवतन भी आ जाता है। सृष्टि का चक्र यहाँ फिरता है। सतयुग त्रेता यहाँ है। यह कोई सूक्ष्मवतन वा मूलवतन में नहीं होते। यह यहाँ ही हैं। इनको मनुष्य सृष्टि कहा जाता है। यहा बाबा क्या समझा रहे है?
सृष्टि का नाटक में ब्रह्मांड और शुक्ष्म वतन भी आता है क्यों कि नाटक के actors और director ब्रह्माण्ड और शुक्ष्म वतन में भी पार्ट बजाते हैं। सृष्टि का चक्र यहाँ फिरता है माना मेरे अंदर आत्मा में फिरता है जब में शरीर मे होती हूँ। सतयुग और त्रेता मुझ आत्मा में ही होता है। आत्मा का सतयुग और त्रेता स्थिति स्थूल वतन में होता है , मूल वतन या सूक्ष्म वतन में नही। ओम शांति