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Showing posts from September, 2020

तुम्हे अपने को आपेही राजतिलक देना है

आज बाबा ने कहा तुम्हे अपने आप को राज तिलक देना है। दुनिया मे जब महाराजा का राज तिलक होता हैं तो बहुत प्रजा इकट्ठा हो जाता हैं। भरि सभा मे राज तिलक किया जाता हैं। वाह वाह होता हैं।  हमारा राज तिलक है रूहानी, गुप्त। स्थूल में राज तिलक होगा सतयुग में नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। पर संगम युग मे हम अपने आपको तिलक देने का अधिकार मिला हुआ है बाबा से। संगम युग मे हम पैर रखते ही आत्मा परिवर्तन का पुरुषार्थ करते हैं। और धीरे धीरे हमारी चढ़ती कला होता है। एक एक अवगुण को मर्ज करते हैं और गुणों को इमर्ज करते हैं। साथ मे बाबा भी हमारे गुणों का माला सिमरन करते हैं। बाबा कहते हैं अटेंशन रख एक एक गुणों को इमर्ज करो। विशेष करके सेवा में अपना चेहरा दर्पण में दिखता है और उसी समय हमें विशेष अटेंशन देना है। बाबा हमे विश्वकल्याणकारी का टाइटल दिया है साथ मे यह भी कहा है कि बच्चे तुम उद्धारमूर्त आधारमूर्त हो । विश्व को परिवर्तन करने के लिए हमे पहले स्वयं को परिवर्तन करना है । हमारा परिवर्तन ही विश्व को आकर्षित करेगा। और हम और बाबा दोनों प्रत्यक्ष होंगे। जैसे लौकिक में कोई बच्चा अच्छा या बुरा चलन होता हैं तो न...

निर्वाणधाम में जाने के लिए पूरा पावन बनना है। रचना के आदि मध्य अंत को पूरा समझकर नई दुनिया मे ऊंच पद पाना है।

निर्वाणधाम, शान्तिधाम जहा हमारे शरीर नही थे और संस्कार भी शरीर का नही था। पूरा पूरा पवन था। अपना अपना पार्ट अनुसार जैसे नीचे आये शरीर मे प्रवेश किया और बहुत बार शरीर बदले तो धीरे धीरे शरीर का संस्कार आ गया। सतोप्रधान से तमोप्रधान बन गए। आत्मा का संस्कार भूल गए। इस अंतिम जन्म में बाबा आते है और हमे घर की याद दिलाते हैं और घर जाने के लिए फिर से अशरीरी बन पावन बनना है। आत्मा का संस्कार को इमर्ज करना है। उसके लिए बाबा हमे पुरुषार्थ कर रहे हैं। तो निर्वाणधाम जाने के लिए पावन बनने के लिए हमे क्या पुरुषार्थ करना है। 1) स्मृति लाना है कि हम परमधाम निवासी हैं और अब घर जाने का समय हो गया है। 2) अपने को आत्मा समझना है और दूसरों को भी आत्मा देखने का प्रैक्टिस करना है। 3) आत्मा का जो गुण हैं उसपर चिंतन करना है और अटेंशन रख उस गुण को धारण करना है। 4) अशरीरी का अभ्यास करना है क्यों कि बाबा कहते हैं अंत समय मे यही अभ्यास काम आएगा। 5) शरीर का संस्कार को अटेंशन रख खत्म करना है। 6) पुरानी दुनिया को भूलना हैं क्यों कि अब खत्म होनेवाला हैं। 7) इन्द्रिय सुख को न भोग अतिन्द्रिय सुख के तरफ आकर्षित होने हैं। 8...

किसी भी विकराल समस्या को शीतल बनाने वाले सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि भव

विकराल समस्या नाम से कुछ बड़ा ही समझ मे आता है जिससे हम हमेशा  घबड़ा जाते हैं और यही घबड़ाने का आदत बन चुका है। समस्या को कम करने का तरीका मालूम ही नही था। अभी बाबा आकर हमे ज्ञान दिया है कि कोई भी समस्या देखने मे असली टाइगर लगता है पर असलियत में होता है पेपर टाइगर। बाबा ने एक मुरली में कहा कि समस्या को समोसा बनाकर कहा जाओ। और हम छोटा सा समस्या आते ही घबराकर आत्मा का शक्ति को घटा लेते हैं और ही समस्या का जाल में फसते जाते हैं। समस्या जब आती है उसी समय उसको डोंट केअर कर उसी लेवल पर खत्म कर दे तो समस्या परेशान नही करेगा। समस्या में उलझने का कारण हम खुद ही होते हैं।  समस्या कितना भी विकराल हो अगर हम अचल अडोल रह सके तो शीतल बन जायेगा। ड्रामा का नॉलेज और प्रैक्टिस हो तो उसी समय ड्रामा का पॉइंट याद आएगा और हम अचल अडोल बन जाएंगे। खेल जैसा लगेगा। समस्या को शीतल बनाने के लिए अपना स्वरूप में टिक अपना स्वस्धर्म का स्मृति जरूरी है और अशरीरी का अभ्यास से ही संभव है। समस्या को शीतल बनाने के लिए सहनशीलता का गुण जरूरी है। छोटे छोटे में ही हम हार जाते हैं। समस्या को शीतल बनाने के लिए समाने की शक्त...

जब आप आपके सारे संबंधों से अपेक्षाओं को समाप्त करके सिर्फ सेवा के भाव से संबंधों का ध्यान रखते हो , तो आप आध्यात्मिक हो।

बाबा कहते हैं देह और देह के सब संबंधों को छोड़ मामेकम याद करो। हम बाबा के बच्चे दुनिया के संबंध , हिसाब किताब के संबंधों को छोड़ कर बाबा के बने हैं। देह को बाबा के सेवा में अर्पण किया है। पर बाबा ने हमे जो श्रीमत दिया है उस पर नही चल कर हम बाबा के घर मे भी रिश्ता जोड़ने लग पड़ते है। वही देह और देह के संबंध में फसते हैं - बाबा कहते हैं माया खा जाती हैं। लौकिक संबंध से हम दृर तो हो गए पर अभी भी सूक्ष्म रूप में मोह हैं। क्यों कि कभी देखा जाता हैं हमारा लौकिक के ऊपर एक्सपेक्टशन्स बहुत हैं। ऐसे ही मेरे साथ एक घटना हुआ जहा सुनैना मुझे कोलकता जाने बोल रही थी माताजी और पिताजी का ध्यान रखने के लिए। मुझे फील हुआ कि मेरे हेल्थ के लिए नही सोच रही।कामना था और गुस्सा आ गया। ऐसे बहुत समय जहा हम अटेंशन नही देते विकार निकल आता है । बाबा कहते हैं अपेक्षा नही रखो , हर बात पे संतुष्ट रहो क्यों कि अब हम गेस्ट हाउस में हैं और हमे घर जाना है  सब कुछ खत्म होने वाला है क्या किसी से अपेक्षा रखना है। अभी तो सिर्फ बाबा ही बाबा और बाबा  से ही हर संबंध। ओम शांति