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Showing posts from January, 2021

ब्राह्मण जीवन- बाप से सर्व संबंध अनुभव करने की जीवन

1) संगमयुग अर्थात मिलन मनाने का युग। ऐसे युग में ऐसा श्रेष्ठ मिलन मनाने के विशेष पार्टधारी हम आत्माएं है। 2) बाबा ने आदि से अंत तक बहुत सारा स्मृति दिलाई है। 3) स्मृति दिला कर स्मृति-स्वरूप बनाये है और उसी के अनुसार हम कर्म कर रहे है। हम स्मृति-स्वरूप आत्माओं के हर कर्म की विशेषता भक्ति में सिमरण करते हैं कीर्तन के रूप मे। 4) भक्त सिमरण करते करते लवलीन हो जाते है क्यों कि हम आत्माएं स्वयं भी बाप के स्नेह में सदा लवलीन रही है। हमारे सिमरण से ही भक्तों को अल्प काल के लिए अंचली रूप में अनुभूति प्राप्त होती है। 5) कदम कदम पर भिन्न भिन्न स्मृति-स्वरूप का अनुभव करते चलना है समय और कर्म अनुसार। 6) अमृतवेला बाप से मिलन मनाते स्मृति रहे - मास्टर वरदाता बन वरदाता से वरदान लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ। डायरेक्ट भाग्यविधाता द्वारा भाग्य प्राप्त करने वाली पद्मापदम भाग्यवान आत्मा हूँ। मास्टर वरदानी बन स्वयं भी सम्पन्न और अन्य आत्माओ को भी वरदान दिलाने वाले वरदानी आत्मा हूँ। 7) भिन्न भिन्न स्मृति-स्वरूप को समय प्रमाण अनुभव करने से बहुत विचित्र खुशी, विचित्र प्राप्तियों का भंडार बन जायेगा और दिल में हम...

वैरायटी विराट ड्रामा

यह वैरायटी विराट ड्रामा रंग बिरंगे है। इस ड्रामा में हर पार्टधारी अलग अलग है भिन्न भिन्न पार्ट बजा रहा है। बाबा कहते है पार्ट अच्छा हो या बुरा पर एक्यूरेट है। उसमें कोई प्रश्न नही होना चाहिए। हर एक पार्ट अपना अपना कार्मिक एकाउंट के हिसाब से बना हुआ है। रांग राइट सब नुंधा हुआ है। जैसे कोई बॉयोस्कोप में हम हर एक एक्टर का पार्ट का आनंद लेते है वैसे ही इस ड्रामा में हर एक का पार्ट का आनंद लेना है। किसी के भी पार्ट से दुखी नही होना है। न ही किसी से नफरत या घृणा करना है। दुसरो का पार्ट को देख अपना स्थिति खराब नही करना है। हर्षित हो हर एक का पार्ट देखना है जैसे कोई मूवी में देखते है। कल्प कल्प एहि पार्ट बजाया है कोई फर्क नही। और हम हिल भी जाये तो भी वो पार्ट बदलेगा नही। बाबा ने कहा है संगठन में यह पॉइंट बहुत अच्छी रीति धारण करनी है। एक दो को ईश्वरीय रूप से देखना है। जैसे बाबा हमे राइट रंग पार्ट प्ले करते हुए देखते है साक्षी हो। हमारा लक्ष्य यही रहे - शांत चित्त, निर्माणचित, धैर्यवत , मिठास, शीतलता देवी गुण इमर्ज करना है। ओम शांति

साक्षीपन की अवस्था

बाबा कहते है साक्षीपन की अवस्था अति मीठी, रमणीक और सुंदर है। साक्षीपन अर्थात जो भी अच्छा बुरा इस नाटक में हो रहा है उसको detach हो कर देखना। उस घटना में involve नही होना, participate नही करना। एक दृष्टा की तरह घटना को enjoy करना। पर उसके लिए छोटे छोटे घटना में साक्षीपन की अभ्यास की जरूरत है। तभी जब कर्मभोग का पेपर आएगा तो साक्षी हो पास्ट का हिसाब किताब भी चुकतु कर सकते है साथ मे भविष्य को भी सुहावना बना सकते है। कोई भी कर्मभोग जब जीवन मे आता है अगर हम उससे परेशान होकर , दुखी होकर उसे भोगते है तो उस बीमारी को और बढ़ा देंगे । साक्षीपन का अभ्यास अगर हो तो हमे यह ज्ञान होगा कि हमारा सारे हिसाब किताब चुकतु हो रहा है। और ब्राह्मण जीवन मे एक मुख्य लक्ष्य है हिसाब किताब चुकतु कर कर्मातीत स्थिति को पाना। तो शारीरिक भोगना कल्याणकारी है। यह है साक्षीपन का सुखस्वरूप पास्ट। और जब ऐसा साक्षीपन अवस्था रहे तो फ्यूचर  भी सारा हिसाब किताब चुकतु हो सुहावना हो जाएगा। जब दोनों कार्य पास्ट और फ्यूचर सिद्ध हो जाता है तो अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होता है। ओम शांति

पहले ज्ञान रूप बन फिर प्रेम इमर्ज करना है

बाबा ने कहा जब कोई परिस्थिति आती है तब पहले ज्ञान रूप बनो फिर प्रेम स्वरूप बनो। बाबा ज्ञान का सागर भी है प्रेम का सागर भी है। दोनों गुण समाया हुआ है। पर पहले ज्ञान फिर प्रेम। बाबा कहते है जब कोई क्रोध में आते है ज्ञान युक्त नही होकर प्रेम स्वरूप बनते है तो माया वार करेगी। क्यों कि उसमें मोह पैदा हो सकता है। अगर कोई क्रोध कर रहे है और हम प्रेम स्वरूप बनते है तो उसका क्रोध और बढ़ जाएगा। क्यों कि उस आत्मा को सपोर्ट का फीलिंग आएगा। पर अगर हम पहले ज्ञान स्वरूप बनते है - जैसे हम उस आत्मा प्रति यह सोच रखते हैं कि यह आत्मा परवश है, माया की मुट्ठी में है तो उसके प्रति पहले रहम का भावना जाएगा । उस प्रकम्पन से आत्मा शांत हो जाएगा फिर प्रेम स्वरूप बनना है। आत्मा जब शांत हो जाएगा तो वो प्रेम उसको समझ मिलने के लिए मदद देगा। ज्ञान रूप बन बच्चे की तरह हर्षित रह सकते है। इस विधि से हम परिस्थिति से प्रभावित नही होंगे। ज्ञान बिगर अगर प्रेम स्वरूप बनेंगे तो विघ्न आ सकता है। ठीक वैसे ही बाबा कहते है ज्ञान बिगर अगर ध्यान में जाएंगे तो विघ्न आ सकता है। तभी ब्रह्मा बाबा अमृतवेला पहले ज्ञान चिंतन करते थे जिससे ...

बगुले दुख देते हैं हंस कभी किसको दुख नही देते

बाबा ने चेक करने कहा है हम हंस है या बगुला है। अगर किसी को दुख देते है तो बगुला। बाबा कहते है बगुला विकारी होते है। आज तक दुसरो को दुख देने में ही मज़ा लिया है, सुख भोगा है। हमे यह पता ही नही था कि किसी को दुख दे कर हमें सुख नही मिल सकता। बाबा का ज्ञान मिला पर अभी भी हम दूसरों को दुख देने में आगे रहते है। अल्प काल का सुख भोगने के लिए श्रीमत को भूल बैठते है। अब तक हमने बहुत ऊर्जा और समय वेस्ट कर लिया। इसलिए अभी अटेंशन रख इस पर काम करना है। दुख देने में मज़ा नही लेना है अतीन्द्रिय सुख का आनंद लेना है। मन को समझा कर दिशा को बदलना है। देवता बनने जा रहे है । सबको हंस की तरह खुशी बाटना है। और खुशी बाटेंगे तो खुशी ही मिलेगा। चेक करना है कहा कहा हम मन्सा से भी किसी को दुख का निमित तो नही बन रहे है। ओम शांति