1) संगमयुग अर्थात मिलन मनाने का युग। ऐसे युग में ऐसा श्रेष्ठ मिलन मनाने के विशेष पार्टधारी हम आत्माएं है। 2) बाबा ने आदि से अंत तक बहुत सारा स्मृति दिलाई है। 3) स्मृति दिला कर स्मृति-स्वरूप बनाये है और उसी के अनुसार हम कर्म कर रहे है। हम स्मृति-स्वरूप आत्माओं के हर कर्म की विशेषता भक्ति में सिमरण करते हैं कीर्तन के रूप मे। 4) भक्त सिमरण करते करते लवलीन हो जाते है क्यों कि हम आत्माएं स्वयं भी बाप के स्नेह में सदा लवलीन रही है। हमारे सिमरण से ही भक्तों को अल्प काल के लिए अंचली रूप में अनुभूति प्राप्त होती है। 5) कदम कदम पर भिन्न भिन्न स्मृति-स्वरूप का अनुभव करते चलना है समय और कर्म अनुसार। 6) अमृतवेला बाप से मिलन मनाते स्मृति रहे - मास्टर वरदाता बन वरदाता से वरदान लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ। डायरेक्ट भाग्यविधाता द्वारा भाग्य प्राप्त करने वाली पद्मापदम भाग्यवान आत्मा हूँ। मास्टर वरदानी बन स्वयं भी सम्पन्न और अन्य आत्माओ को भी वरदान दिलाने वाले वरदानी आत्मा हूँ। 7) भिन्न भिन्न स्मृति-स्वरूप को समय प्रमाण अनुभव करने से बहुत विचित्र खुशी, विचित्र प्राप्तियों का भंडार बन जायेगा और दिल में हम...