2 दिन पहले एक छोटा सा पेपर आया था और उस पेपर में मैं फैल हो गयी। पेपर था डिस्पेंसरी का timing के ऊपर।अधिकार से जवाब दिया था पर डिसरीगर्ड किया और मेरा स्थिति भी खराब हो गया। स्थिति खराब होते गलती भी खूब किया क्यों कि बुद्धि में ताला लग गया था। उस स्थिति से निकलने में मुझे पूरे एक दिन लगा। फिर हमने उस घटना का चिंतन किया कहा मेरी गलती थी और मुझे कहा सावधान होना जरूरी है। जब मनन किया तो मैने देखा कि पेपर डिस्पेंसरी के बहार भी आता है पर वहा न फील होता न ही react करते है। easily सहन कर लेते है। checking करने पर पता चला कि मेरे सेवा स्थान के आत्माओं के साथ अटैचमेंट था। तुररन्त मैं अपने ऊपर काम करने लगी। खुद को इस परिवार से डिटैच किया और एकांत कर दिया। अंतर्मुखी हो गयी। जहा सेवा की जरूरत है वहा बात किया और फिर एकांत। अचानक मेरे में चेंज देख सेवा साथी असंतुष्ट भी हुए। मै थोड़ा confused थी - मैं जो कर रही हूं वह राइट या रॉंग। अमृतवेला बाबा के झोपड़ी में जा कर बाबा को कहा- बाबा मै जो हु जैसा भी हु आपका हु। मुझे राइट रॉंग का परख नही आप मुझे गाइड करना। बाबा ने झट कहा बच्ची तुम चिंता मत करो मैं बैठा ह...